चाय और पुस्तक से बना सेतु
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अधखुली आँखों से मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डालते ही विनय उठ बैठा। जबतक इनकमिंग कॉल की रिंग बजती रही उसकी नज़रें मोबाइल स्क्रीन पर ही टिकी रहीं। दुबारा लेटने को ही था कि फिर से वही नाम डिस्प्ले हुआ .....
पहली बार तो उसे लगा था कि शायद गलती से कॉल लग गया होगा लेकिन दूसरी बार कॉल आने पर उसने रिसीव कर लिया।
"गुड मोर्निंग ! आज सुबह की चाय मेरे यहाँ पीते हुए ऑफिस जा सकोगे क्या ?"
विनय को कुछ जवाब नहीं सुझा ...
दुबारा यही प्रश्न रिपीट हुआ तो उसने बस इतना कहा
"ठीक है ... कितने बजे ?"
"8 या उससे पहले आ सको तो और बेहतर।"
"ओके"
फोन रखने के बाद विनय के मन में कई बातें घुमड़ने लगी। उसे लगा कि अपने किसी लॉयर मित्र से इस बाबत बात करूँ या चला जाऊं सीधे! या फिर उसके घर न जाकर किसी कैफेटेरिया में मिलने को कह दूँ ...
इन्ही विचारों में खोए हुए ही वह साढ़े सात बजे रेडी होकर श्वेता के घर के लिए निकल पड़ा।
डोर बेल रिंग करने की जरुरत नहीं पड़ी। श्वेता गेट पर ही इंतज़ार करती हुई मिली।
हॉल पर विनय को बैठा कर अख़बार पकड़ाते हुए श्वेता अंदर चली गई। अख़बार परे रखते हुए विनय ने एक सरसरी निगाह हॉल पर दौड़ाई। बुक शेल्फ में पहले से ज्यादा किताबें थी, दिवाल घड़ी दूसरी थी ..... न, ये तो बैडरूम वाली दिवाल घड़ी थी ... अब हॉल में लगा दि गई है। और ...... बेडरूम वाली वाल क्लॉक ही नहीं, फ़ोटो फ्रेम भी अब हॉल में। विनय सोचा कि इस वाल क्लॉक और फ़ोटो फ्रेम का बैडरूम से निकल कर बैठकखाने में आ जाना .... और अचानक से चाय के लिए बुलावा भी..... कुछ-न-कुछ बात तो जरूर है। अब उसे लगा कि किसी लॉयर फ्रेंड से कंसल्ट कर या साथ लेकर आना ही बेहतर होता।
श्वेता दुबारा हॉल में आई तो उसके विचारों की तन्द्रा टूटी। नीली साड़ी और मैचिंग चूड़ी-बिंदी में खूबसूरत लग रही थी श्वेता।
विनय को चुपचाप बैठे देख श्वेता बोली,
"चाय ?"
विनय सेंटर टेबल की ओर देखा लेकिन चाय तो वहाँ थी नहीं। वो मूढ़ सा श्वेता की ओर देखने लगा।
"चाय पियोगे न ?" श्वेता हँसते हुए बोली।
"अम्म ... हाँ।"
"तो किचन में जाकर बनाओ ।"
विनय को कुछ समझ नहीं आया। वो ब्लेंक फेस बना कर श्वेता को देखने लगा।
" 10 साल पहले आज ही के दिन तुमने पूछा था कि क्या तुम रोज सवेरे उठ कर मेरे हाथ का चाय पीना पसंद करोगी ? तब तो मैंने हाँ कहा था। फिर अब 14 महीने और 21 दिन से खुद बना कर क्यों पी रही हूँ ?"
विनय अपलक उसे देखे ही जा रहा था।
"अच्छा, ये छोड़ो। मुझे बताओ कि .....
'अपने आपको पूरी तरह समाप्त करके ही तुम उसे पा सको तो पा सको, अपने को बचाए रखकर तो उसे खोना ही पड़ेगा।'
ये लाइन्स किस बुक से है ?" श्वेता हँसते हुए पूछी।
विनय की नज़रे बुक शेल्फ की ओर उठ गई .. लेकिन वो चुप ही रहा।
" खोना .... पाना .... अपने को बचाना ... ये सब मुझे समझ नहीं आता विनय। पिछले सप्ताह पता नहीं क्या हुआ तो सोचा कि बुक्स की डस्टिंग कर दी जाए और डस्टिंग करते हुए तुम्हारे गिफ्ट किये हुए एक बुक पर नज़र पड़ी। एक बैठक में ही पूरा पढ़ गई थी और दुबारा भी पढ़ा। पिछले कई दिन बस उहापोह में ही बीते। ऑफिस से भी छुट्टी ले रखी है मैंने इन दिनों। सुनो ! आज दस साल बाद .. propose day पर ही पूछ रही हूँ कि क्या तुम मेरे लिए रोज सवेरे चाय बनाओगे ?", क्रमशः डूबते हुए आवाज़ में श्वेता बोली।
विनय उठ कर बुक शेल्फ के पास खड़े होते हुए बोला "इस प्रश्न पर मेरा कॉपी राईट है। चीटिंग मत करो। वैसे ये वाल क्लॉक और फ़ोटो फ्रेम हॉल में क्यों ?"
"ताकि इन्हें देख कर तुम्हें कुछ याद आए और मुझे ना नहीं कह सको।"
"नीले सूरज को कभी भी मैंने न कहा है ?", कहते हुए विनय ने उसकी नीली बिंदी को थोड़ा सा नीचे कर दिया।
"मैंने जानबूझ कर ऊपर लगाया था", स्माइल करती हुई श्वेता बोली।
विनय की नज़रे फिर से बुक शेल्फ में कुछ ढूंढने लगी।
उसकी नज़रों का पीछा करते हुए श्वेता बोली, " जो बुक तुम ढूंढ रहे हो वो तुम्हारे बैडरूम में अंदर पड़ी है।"
" वो लाइन्स जो तुमने पूछी थी वो मेरी पसंदीदा बुक 'आपका बंटी' से है", मुस्कुराता हुआ विनय किचन की ओर बढ़ते हुए बोला
"तुम्हारी नहीं .... हमारी पसंदीदा बुक ... और हाँ, आज दस साल के बाद भी मेरा जवाब हाँ ही है .... रोज सुबह तुम्हारे हाथ की ही चाय पीना पसंद करुँगी।"
©वेद
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