दर्पण
जब प्रतिबिंब बनने लगे धुंधली,
तो मत देना दोष कमरे की रौशनी को ।
ना ही देना दोष उस उड़ते बादल को।
और ना ही डूबते सूरज को।
सहला देना दर्पण को,
गीले रुमाल,आस्तीन या आंचल की कोर से।
छंट जायेंगे सारे बादल,
खिल आएगा एक चाँद।
जब प्रतिबिम्ब बनने लगे आधी अधूरी,
मत देना दोष खुद के मुखड़े को।
ना ही देना दोष उस शीशे को।
और ना ग्रहण लगे आधे सूरज को।
देखना नीचे,
बिखरे मिलेंगे शीशे के टुकड़े।
कलाई से घड़ी उतार,
चुन लेना हर एक को।
वक्त की सलाई में, प्रेम की ऊन लपेट,
जोड़े जा सकटे हैं, खंडित मन और दर्पण।
बस भूल जाना,
कलाई से उतारी घड़ी को।
©
वेद
👌❤️
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