Friday, February 19, 2021

दर्पण

दर्पण

जब प्रतिबिंब बनने लगे धुंधली,
तो मत देना दोष कमरे की रौशनी को ।
ना ही देना दोष उस उड़ते बादल को।
और ना ही डूबते सूरज को।

                      सहला देना दर्पण को,
                    गीले रुमाल,आस्तीन या आंचल की कोर से।
                        छंट जायेंगे सारे बादल,
                       खिल आएगा एक चाँद।

जब प्रतिबिम्ब बनने लगे आधी अधूरी,
  मत देना दोष खुद के मुखड़े को।
  ना ही देना दोष उस शीशे को।
  और ना ग्रहण लगे आधे सूरज को।

                                    देखना नीचे,
                       बिखरे मिलेंगे शीशे के टुकड़े।
                           कलाई से घड़ी उतार,
                          चुन लेना हर एक को।

वक्त की सलाई में, प्रेम की ऊन लपेट,
जोड़े जा सकटे हैं, खंडित मन और दर्पण।
           बस भूल जाना,
     कलाई से उतारी घड़ी को।

©
वेद

Tuesday, February 16, 2021

ज्वार

ज्वार
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बहुत ही सुन्दर था उसका प्रेमी
या फिर उसे खोने से डरती थी वो,

इसलिए छुपा रखा था
उसे अपने हृदय तल में।

केवल दानव ही नहीं
देव भी डरा करते हैं सच्चे प्रेम से।

और फिर, जग कल्याण के नाम पर
कर दिए गए दोनों विलग।

जब इस विरह से हो आकुल
उसका जलन पहुँचता है चरम पर,
या फिर दुःख से वो
छुप जाता है किसी स्याह कोने में,
उफन आती है वो
उसे अपने शीतल आलिंगन में भर लेने को।

ठीक इसी वक्त मुस्कुरा उठता है
खिदिरपुर डॉक में ज्वार के लिए प्रतीक्षारत प्रेमी

और मुस्कुरा उठती है एक बिंदी
सुदूर अंडमान में।

जल और चन्द्रमा तो मिल नहीं पाते,
लेकिन इनके विरह के ज्वार से गति पाकर,

कई जलयान दौड़ पड़ते हैं,
बिछड़े प्रेमियों को मिलाने को।
©
वेद

(ऐसा माना जाता है कि समुद्र मंथन में समुद्र के अंदर से चाँद निकला था; अमावस्या और पूर्णिमा को समुद्र में उच्च ज्वार आता है)

Saturday, February 13, 2021

First Kiss

First kiss
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TV पर "rape survivors" पर एक डाक्यूमेंट्री आ रही थी। And this lady came on screen without covering or blurring her face. She was beaming, " honor doesn't lie between my thighs. Forcible penetration and sex are two different things. If I'm ever asked to say something about my first sex, does that incident of forcible penetration will qualify for it ? No, it won't. It was same as scratching, biting , beating or groping someone forcibly. "

मीनू इस महिला की सारी बातों से सहमत प्रतीत नही होती थी। लेकिन कहीं न कहीं इस प्रोग्राम ने उसके मन मस्तिष्क पर एक बवंडर पैदा कर दिया था।

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जैसे ही छुट्टी की घंटी बजी, क्लास 12 के बच्चे शोर मचाते हुए दरवाजे की तरफ भागे। मीनू पीछे थी। वो रोज ही, अपनी सहेली नीरा के साथ, सबसे पीछे निकलती थी। नीरा का एक पैर पोलियो के कारन कमजोर था और मीनू उसके साथ...उसका हाथ पकड़े हुए निकलती थी। तभी सुयश ने उसे पीछे से जकड़ते हुए उसे जबरदस्ती किश कर लिया था। मीनू को तो काठ मार गया था लेकिन नीरा का झन्नाटेदार तमाचा सुयश के गलों को लाल कर गया था।

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TV ऑफ कर मीनू ने अपनी वर्षों पुरानी डायरी निकाली। उस पन्ने को ढूंढा जिसपर ये लिखा था कि मेरा पहला चुम्बन कलुषित था। उस पन्ने को उसने फाड़ दिया। अपने पुराने चिट्ठियों के बण्डल से निहाल का वो प्रथम ख़त निकाली जिसपर लिखा था "lots of kisses".
उस ख़त के ऊपर उसने रेड इंक से लिख दिया, " my first kiss" और पुरानी डायरी के फाड़े हुए पन्ने की जगह पर इस ख़त को चिपका दिया।

©
~ वेद प्रकाश ~

Friday, February 12, 2021

तुम नीलकंठ

तुम नीलकंठ
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"हल्लो ! अभी तक सो रहे हो क्या ?"

" हाँ, आज छुट्टी है। लेट तक सोऊंगा", उनींदी आवाज़ में मैंने कहा।

"न, आज नहीं। नहा कर शिव मंदिर के बाहर मिलो। और सुनो, कुछ खाना मत।"

मैं समझ गया कि छुट्टी के दिन इन्हें शिव मंदिर के पास वाले ढाबे में दही-पराठा खाना होगा। तैयार होकर पहुंचा तो मैडम नए रूप में ही थीं।
सफ़ेद कुर्ते पर लाल चुन्नर, लाल बिंदी और दोनों कलाइयों में एक-एक लाल चूड़ी। अप्रतिम सुंदरी लग रही थी। खैर, एक स्माइल देकर उसकी ऊँगली पकड़ ढाबे की ओर बढ़ने को हुआ तो वो हाथ खिंचती हुई , शिव मंदिर को दिखाते हुए बोली कि आज इधर, उधर नहीं।

मेरे चेहरे पर प्रश्न के भाव पढ़ कर बोली कि आज किस चीज़ की छुट्टी है तुम्हारी ?

"शिव अष्ठमी की", अटकते हुए मैंने कहा।

अपनी हँसी को रोकने का कोशिश करते हुए बोली, "शिव अष्ठमी नहीं, शिव रात्रि की बुद्धू।"

"जो भी हो, तुम्हे पता है न कि मैं मंदिर नहीं जाता हूँ।"

"हाँ, लेकिन आज चलो तो सही। मेरे लिए।"

खैर, उनके पीछे यंत्रवत चलते हुए मंदिर में जो भी formalities की जाती हैं वो रोबोट की तरह निबटा डाला।

"अब चलें ब्रेकफास्ट के लिए ?"

" पहले थोड़ी देर तलैया के पास वाली सीढ़ी पर बैठते हैं।"

सीढ़ी पर बैठ उनके लाल चूड़ी पर ऊँगली फंसाते हुए मैंने कहा कि मेरे लिए शिव तुम ही हो।

"कैसे?"

"क्योंकि कितनी बार तो तुम मेरी गलतियों को पी जाती हो। गलतियाँ ही तो विष होती हैं। हर बार मुझसे कुछ-न-कुछ गलतियाँ होती है और तुम..."

उसने लाल चूड़ी वाली दूसरी कलाई से मेरे मुँह को बंद कर बात पूरी करने से रोक लिया।

कुछ देर की ख़ामोशी के बाद बोली कि मेरा गला तुम्हे कभी नीला दिखाई देता है ? नहीं न। अगर कुछ पीती भी हूँ तो उसे फिर तुम ही तो बाहर निकाल देते हो।

एक लंबी ख़ामोशी के बाद .... माहौल को हल्का बनाने के लिए उसे अपनी ओर खींचते हुए कहा कि आज kiss day भी है।

"आज मेरा व्रत है", मुझे परे ठेलते हुए बोली।

"लेकिन मेरा तो व्रत नहीं है न !" मैंने थोड़ा शरारती लहजे में कहा।

"हाँ, पता है कि तुम व्रत नहीं रख सकते। चलो तुम्हारे किये दही-पराठा आर्डर करते हैं।"

"और kiss day ....?"

"कहा न मेरा व्रत है। अब चलो यहाँ से।"

© वेद

NB : जिस साल ये कहानी लिखी थी उस साल शिवरात्रि भी थी

Tuesday, February 9, 2021

गुलक का कर्ज

गुलक का कर्ज
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निभी ने मोबाइल पास करते हुए आँखों के इशारे से पूछा कि किसका कॉल है !

फोन स्क्रीन पर "Roomie"  डिस्प्ले हो रहा था। ये देखते ही थोड़ा आश्चर्य हुआ। कॉल रिसीव करते ही मैंने कहा, "कहाँ मर गए थे बे।" फिर थोड़ी इधर उधर की बात हुई। ये अनुमान लगाना कोई टेढ़ी खीर नहीं थी कि all is not well at the other end. मैंने स्पष्ट ही पूछा लिया कि मैटर क्या है, आफ़ताब ?
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आफ़ताब ,   ....यानी कि मेरा रूम मेट...कॉलेज के समय का नहीं....क्लास 8 से 10 तक मैं हॉस्टल में था...तब का...जिससे काफी समय से कोई कांटेक्ट नहीं था..कोई 3 साल पहले FB पर फिर मिला और नंबर का आदान-प्रदान हुआ। Life has not treated him well, at least so called career wise. कभी कभी FB मैसेंजर पर hi-hello हो जाती थी पर मिलने की बात पर वो टाल जाता था और मैंने भी कोई एफर्ट नहीं डाला।

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आफ़ताब ने बताया कि वो हाउसिंग लोन के क़िस्त चुकाने में डिफ़ॉल्ट कर गया है और उसे बैंक से कानूनी नोटिस आई है। अगर पैसे की व्यवस्था हो पाती तो वो लोन चूका देता। exact amount सुनने के बाद मैंने तुरंत कहा , "फिकर नॉट, आज शाम तक 100% हो जायगा।"

बगल में बैठी निभी का मुँह देखने लायक था। तड़ाक से उसने सवाल दागा कि कहाँ से शाम तक व्यवस्था होगी ? और ये सुनकर कि मैं फिक्स्ड डिपॉजिट्स तुड़वा कर पैसे की व्यवस्था करूँगा, उनका पारा सातवें आसमान पर !!

निभी को शांत करते हुए मैंने कहा कि एक कहानी सुनो पहले.....

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आर्चीज की दुकान पर दो 14 -15 साल के लड़के एक teddy bear को निहार रहे थे। एक ने उसपे चिपके प्राइस टैग को देखकर और अपने जेब में रखे रूपये का हिसाब लगाते हुए मुँह लटकाकर दूसरे का हाथ पकड़ते हुए कहा कि चल यार...अपने रेंज का नहीं। दो घंटे बाद दोनों फिर से उसी दुकान पर थे और उस teddy bear को पैक करवा रहे थे। दूसरे लड़के ने अपनी गुलक तोड़ कर पैसे जुटा दिए थे..ये पैसे वो घडी खरीदने को जोड़ रहा था। और वो teddy bear आज 22 साल का है और अभी भी उस लड़की का सबसे प्यारा धन है जिसे ये दिया गया था।

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...कुछ देर की ख़ामोशी और कुछ हिसाब किताब लगाते हुए निभी ने कहा कि अभी अपने रूमी को फोन करो और साफ़ कह दो कि आज शाम तक तुम पैसों की व्यवस्था नहीं कर सकते...3 दिन बाद दे पाओगे। अब चौकने की बारी मेरी थी। निभी मेरे चेहरे को पढ़ते हुए बोली कि निलय के लिए जो चाइल्ड प्लान हमने लिया था वो 3 दिन बाद mature कर रहा है, उससे मिलने वाले पैसों से गुलक वाला पैसा तो नहीं चूका पाओगे लेकिन तेरे रूमी के होम लोन की कई किस्ते मैनेज हो जायगी। निभी ने शो केस पर बैठे teddy bear को एक स्माइल दिया और मुझे......

©

Monday, February 8, 2021

प्रोपोज़

प्रोपोज़
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बिड़ला मंदिर में दोनों एक-डेढ़ घंटे तक बैठ कर बातें करते रहे। आज वो दोनों खूब सारी बातें कर रहे थे और ऐज यूज़वल(as usual) बिना वोकल कॉर्ड(vocal cord) यूज़(use) किए । पब्लिक प्लेस(public place) में जब भी दोनों घंटो गप्पे मारते थे तो ऐसे ही, बिना शब्द निकाले। फिर जब दोनों को एक-दूसरे की आँखों में कॉफ़ी की तलब दिखी तो उठ कर इंडस वैली रेस्टोरेंट की तरफ चल पड़े। पहला सिप(sip) लेते ही वोकल कॉर्ड में हरकत हुई और उसने कहा कि पापा मेट्रिमोनियल(matrimonial) में एड(ad) देने वाले हैं। इसपर उसने उसकी खूब खिंचाई की। हर सिप के साथ खिंचाई बढ़ते जाता था। लास्ट सिप लेते ही उसने हँसते हुए कहा कि मेरा भी बायोडाटा पोस्टमैन दे आएगा।

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उस दिन वेटर को अनयूज़वल(unusual) टिप(tip) मिला। उसने भाई को बर्थडे गिफ्ट देने के लिए पैंटालून(pantaloons) का गिफ्ट वाउचर(gift voucher) लिया था | उस गिफ्ट वाउचर को वेटर को पकड़ाते हुए उसने कहा था, "भैया, इस बिल को गड़ियाहाट पैंटालून में देकर एक शर्ट  ले लीजिएगा।"

©
वेद

चाय और पुस्तक से बना सेतु

चाय और पुस्तक से बना सेतु
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अधखुली आँखों से मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डालते ही विनय उठ बैठा। जबतक इनकमिंग कॉल की रिंग बजती रही उसकी नज़रें मोबाइल स्क्रीन पर ही टिकी रहीं। दुबारा लेटने को ही था कि फिर से वही नाम डिस्प्ले हुआ .....
पहली बार तो उसे लगा था कि शायद गलती से कॉल लग गया होगा लेकिन दूसरी बार कॉल आने पर उसने रिसीव कर लिया।

"गुड मोर्निंग ! आज सुबह की चाय मेरे यहाँ पीते हुए ऑफिस जा सकोगे क्या ?"

विनय को कुछ जवाब नहीं सुझा ...

दुबारा यही प्रश्न रिपीट हुआ तो उसने बस इतना कहा

"ठीक है ... कितने बजे ?"

"8 या उससे पहले आ सको तो और बेहतर।"

"ओके"

फोन रखने के बाद विनय के मन में कई बातें घुमड़ने लगी। उसे लगा कि अपने किसी लॉयर मित्र से इस बाबत बात करूँ या चला जाऊं सीधे! या फिर उसके घर न जाकर किसी कैफेटेरिया में मिलने को कह दूँ ...
इन्ही विचारों में खोए हुए ही वह साढ़े सात बजे रेडी होकर श्वेता के घर के लिए निकल पड़ा।

डोर बेल रिंग करने की जरुरत नहीं पड़ी। श्वेता गेट पर ही इंतज़ार करती हुई मिली।

हॉल पर विनय को बैठा कर अख़बार पकड़ाते हुए श्वेता अंदर चली गई। अख़बार परे रखते हुए विनय ने एक सरसरी निगाह हॉल पर दौड़ाई। बुक शेल्फ में पहले से ज्यादा किताबें थी, दिवाल घड़ी दूसरी थी ..... न, ये तो बैडरूम वाली दिवाल घड़ी थी ... अब हॉल में लगा दि गई है। और ...... बेडरूम वाली वाल क्लॉक ही नहीं, फ़ोटो फ्रेम भी अब हॉल में। विनय सोचा कि इस वाल क्लॉक और फ़ोटो फ्रेम का बैडरूम से निकल कर बैठकखाने में आ जाना .... और अचानक से चाय के लिए बुलावा भी..... कुछ-न-कुछ बात तो जरूर है।   अब उसे लगा कि किसी लॉयर फ्रेंड से कंसल्ट कर या साथ लेकर आना ही बेहतर होता।

श्वेता दुबारा हॉल में आई तो उसके विचारों की तन्द्रा टूटी। नीली साड़ी और मैचिंग चूड़ी-बिंदी में खूबसूरत लग रही थी श्वेता।

विनय को चुपचाप बैठे देख श्वेता बोली,

"चाय ?"

विनय सेंटर टेबल की ओर देखा लेकिन चाय तो वहाँ थी नहीं। वो मूढ़ सा श्वेता की ओर देखने लगा।

"चाय पियोगे न ?" श्वेता हँसते हुए बोली।

"अम्म ... हाँ।"

"तो किचन में जाकर बनाओ ।"

विनय को कुछ समझ नहीं आया। वो ब्लेंक फेस बना कर श्वेता को देखने लगा।

" 10 साल पहले आज ही के दिन तुमने पूछा था कि क्या तुम रोज सवेरे उठ कर मेरे हाथ का चाय पीना पसंद करोगी ? तब तो मैंने हाँ कहा था। फिर अब 14 महीने और 21 दिन से खुद बना कर क्यों पी रही हूँ ?"

विनय अपलक उसे देखे ही जा रहा था।

"अच्छा, ये छोड़ो। मुझे बताओ कि .....

'अपने आपको पूरी तरह समाप्त करके ही तुम उसे पा सको तो पा सको, अपने को बचाए रखकर तो उसे खोना ही पड़ेगा।'

ये लाइन्स किस बुक से है ?" श्वेता हँसते हुए पूछी।

विनय की नज़रे बुक शेल्फ की ओर उठ गई .. लेकिन वो चुप ही रहा।

" खोना .... पाना .... अपने को बचाना ... ये सब मुझे समझ नहीं आता विनय। पिछले सप्ताह पता नहीं क्या हुआ तो सोचा कि बुक्स की डस्टिंग कर दी जाए और डस्टिंग करते हुए तुम्हारे गिफ्ट किये हुए एक बुक पर नज़र पड़ी। एक बैठक में ही पूरा पढ़ गई थी और दुबारा भी पढ़ा। पिछले कई दिन बस उहापोह में ही बीते। ऑफिस से भी छुट्टी ले रखी है मैंने इन दिनों। सुनो ! आज दस साल बाद .. propose day पर ही पूछ रही हूँ कि क्या तुम मेरे लिए रोज सवेरे चाय बनाओगे ?", क्रमशः डूबते हुए आवाज़ में श्वेता बोली।

विनय उठ कर बुक शेल्फ के पास खड़े होते हुए बोला "इस प्रश्न पर मेरा कॉपी राईट है। चीटिंग मत करो। वैसे ये वाल क्लॉक और फ़ोटो फ्रेम हॉल में क्यों ?"

"ताकि इन्हें देख कर तुम्हें कुछ याद आए और मुझे ना नहीं कह सको।"

"नीले सूरज को कभी भी मैंने न कहा है ?", कहते हुए विनय ने उसकी नीली बिंदी को थोड़ा सा नीचे कर दिया।

"मैंने जानबूझ कर ऊपर लगाया था", स्माइल करती हुई श्वेता बोली।

विनय की नज़रे फिर से बुक शेल्फ में कुछ ढूंढने लगी।

उसकी नज़रों का पीछा करते हुए श्वेता बोली, " जो बुक तुम ढूंढ रहे हो वो तुम्हारे बैडरूम में अंदर पड़ी है।"

" वो लाइन्स जो तुमने पूछी थी वो मेरी पसंदीदा बुक 'आपका बंटी' से है", मुस्कुराता हुआ विनय किचन की ओर बढ़ते हुए बोला

"तुम्हारी नहीं .... हमारी पसंदीदा बुक ... और हाँ, आज दस साल के बाद भी मेरा जवाब हाँ ही है .... रोज सुबह तुम्हारे हाथ की ही चाय पीना पसंद करुँगी।"

©वेद

Saturday, February 6, 2021

एक डंठल प्रेम का

एक डंठल प्रेम का
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रुई के फाहे की तरह गिरती बर्फ ....... बर्फ से ढंके होने पर भी सूखता ओंठ ... उखड़ती साँस .... लाल होता बर्फ ... ठाँय-ठाँय की आवाज़ .......

और पसीने से तर-बतर सुमन ....

उफ़्फ़ ... फिर से यही सपना। आँख मूंदे-मूंदे ही सुमन ने करवट बदल कर निखिल को बाँहों में भर लेना चाहा .... लेकिन करवट बदलते ही खाली बेड .... घबरा कर आँखे खोल लीं सुमन ने।

सुबह हो चुकी थी ... रोशनदान से सुनहली किरणें छन कर कमरे में आ रही थीं

.... निखिल कहाँ गया ! ये सोचते हुए वो उठने को हुई ही थी कि अपने हाथों में कुछ छिपाये हुए निखिल कमरे में दाखिल हुआ।

"हेपी, लोज डे" कहते हुए निखिल ने एकदम सुर्ख लाल गुलाब सुमन की ओर बढ़ा दिया।

"छो छ्वीट ऑफ़ यू" कहते हुए सुमन ने गुलाब ले लिया और निखिल ने सुमन के chin पर मुस्कुराते हुए काले तिल को चूम लिया। इस चुम्बन का असर या निखिल की warm huggy का असर ... या पता नहीं क्या था कि बंद कमरे में भी सुर्ख गुलाब पर ओस की दो बूंदे टपक पड़ी।

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सुमन को अक्सरहां निखिल में हर्ष का अक्स दिखाई देता है .... या फिर हर्ष को वो निखिल में ढूंढती है। हर्ष उसके कॉलेज का दोस्त ... सुमन और हर्ष की जोड़ी कॉलेज में फेमस थी।
घर वालों के विरोध के बावजूद दोनों ने शादी कर लिया था और अपनी गृहस्थी बसा ली थी।

शादी के चौथे साल ..... वैलेंटाइन डे के दिन हर्ष कोलकाता में था और सुमन अपने घर डेल्ही में। हर्ष ने  अपने स्टाफ के through उसे वैलेंटाइन गिफ्ट भिजवाया था .... गिफ्ट खोलने के बाद सुमन फोन कर हर्ष से पूछी थी,
" मेरे शाहजहाँ, इस डंठल का मैं क्या करूँ ?"

और उधर से हर्ष ने कहा था कि बाग़ में लगा दो .... किसी साल अगर मैं वहाँ न रहूँ तो इस डंठल से जो गुलाब पौधा उग आएगा, उसपर खिले गुलाब को मेरी तरफ से गिफ्ट समझ लेना।

कॉलेज में शुरू हुई प्रेम कहनियों में अक्सरहां ग्रहण लग ही जाता है। ये दोनों भी विधाता से अपनी प्रेम कहानी बस 7 साल के लिए लिखवा कर लाए थे।

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निखिल अब सुमन के तिल पर उँगलियाँ फिरा रहा था और सुमन हर्ष में खोई थी ...आँखों से अभी और ओस की बूंदे टपकने ही वाले थे कि ड्राइंग रूम में किसी ने टीवी या म्यूजिक सिस्टम ऑन कर दिया था और गाना बज रहा था ...

"ओ यूँ ना लम्हा लम्हा मेरी याद में
होके तन्हा तन्हा मेरे बाद में नैना अश्क ना हो
माना कल से होंगे हम दूर
नैना अश्क ना हो, नैना अश्क ना हो

मैं ना लौटू आने वाले साल जो
मेरी वर्दी बोले मेरे हाल तो अश्क ना हो
ये समझना मैं हूँ मजबूर
नैना अश्क ना हो, नैना अश्क ना हो "

             और सुमन ने एक सैलाब को आँखों में ही जब्त कर लिया और निखिल को चूमते हुए बोली,

"लव यू, हर्ष"

"अले, मैं तो निक्कू हूँ दादी। तुम मुझे दादा जी के नाम छे क्यों बुलाती हो",  कसमसाकर सुमन से अलग होते हुए निखिल बोला।

और हर्ष, जो की शादी के सातवें साल ही बर्फीले बॉर्डर की रक्षा करते हुए शहीद हुआ था, के द्वारा दसकों पहले भेजे हुए डंठल से उग आए बगान से निकले गुलाब को चूमते हुए सुमन बोली,

"हैप्पी रोज डे, हर्ष"

~वेद~