गंगा दियारा में जूट के खेत में एक नन्हा-सा पौधा था। एक छोटी-सी बच्ची किसी बात पर रोती हुई उधर से गुज़र रही थी। शायद खिलौना टूटने या गुम हो जाने के दुःख पर वो रो रही थी। उसे रोता देख जूट का वो नन्हा पौधा खिलखिलाकर हँस दिया। बच्ची को लगा कि कोई हँसा है, कोई उसके ऊपर हँसा है। दुःख क्रोध में बदल गया। लेकिन पौधे की भाषा और इंसान की भाषा एक कहाँ होती है ! बच्ची को पता नहीं चल पाया कि कौन उसके ऊपर हँसा। जो दुःख क्रोध में बदला था, वो अब दीनता में बदल गया....
इस वाकया को कुछ बरस बीते होंगे। इस बीच दुनिया में कितने खिलौने टूटे, कितने आँसू ढलके। उस हँसने वाले जूट के पौधे से निकला रेशा एक खूबसूरत बैग का हिस्सा बना। वो खूबसूरत बैग एक खूबसूरत लड़की को गिफ्ट में मिला और उसका पसंदीदा हैण्ड बैग बना। वो रेशा अपनी किस्मत पर इठलाता था।
लड़की खुश रहती थी, चलते-चलते यूँ ही मुस्कुरा उठती थी; वो प्रेम में थी, जूट का रेशा भी प्रेम में था।
शाम ढली, अँधेरा आया और रात अमावश की। लड़की का दिल टूटा, मुस्कान गई। दिल टूटा तो टूटे दिल को नदी में विसर्जित कर आई। जूट का गिफ्टेड हैण्ड बैग अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में इस विशाल दुनिया में कहीं जाकर किनारे लगा। एक चरवाहे की नज़र उस बैग पर पड़ी तो उसने उस फटेहाल बैग को खेलने के लिए उठा लिया। उस चीथड़े बैग को देख चरवाहे का मेमना खिलखिलाकर हँस पड़ा। जूट के रेशे को लगा कि कहीं कोई हँसा, एकदम जानी-पहचानी सी हँसी।
© वेद