Saturday, August 8, 2020

दीप का दायरा

दवाई की खाली शीशी या ऐसे ही किसी शीशी का दीया बना कर यूज़ किया जाता था। फिर "मिट्टी तेल" से जलने वाले लैंप /लालटेन का जमाना आया। रौशनी तेज आती थी और हवा से सुरक्षा भी थी लेकिन लैंप का शीशा नित्य साफ़ करना पड़ता था। साफ़ करते समय कभी-कभी हाथ कट भी जाता था। लौ को भी एडजस्ट कर रखना पड़ता था ; ज्यादा तेज हुआ नहीं कि तुरंत कालिख बैठ जाती थी।  लैंप के शीशे के टॉप पर एक "cylindrical टोपा" जोड़कर कालिख जमने के रेट को कम किया जाता था। बाद में लैंप के साथ फ्रेम और टिन का टोपा आने लगा।

अँधेरे से लड़ने पर कालिख तो लगता ही है; कम करने के उपाय भी हैं। सामर्थ्य से ज्यादा करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।

Sunday, June 21, 2020

सफ़ेद आँसू

सफ़ेद आँसू
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....घुटना छिल गया था तुम्हारा। आँखों में दर्द से ज्यादा दुःख के आँसू थे। घर लौटते ही मम्मी के प्यार से बाँध टूट गया और आँसू झर-झर गिरने लगा। डेटॉल लगाते हुए तुम्हारी मम्मी कह रहीं थी कि मुझे ध्यान देना चाहिए था...कैसे गिर गया ! कंघी करते हुए मैंने देखा कि कनपट्टी के पास का एक बाल सफ़ेद हो गया है !

अगले सुबह तुम्हारा मन नहीं था साथ चलने का। मम्मी भी कह रहीं थी कि अगर चोट दुःख रहा है तो आज मत जाओ। तुम मेरी तरफ देख रहे थे और कोई रिस्पांस न पाकर साथ चल पड़े। आज disbalance होने से पहले ही तुम्हारी साइकिल को मैं थाम तो ले रहा था लेकिन आज कुछ सीख भी न पाए तुम !

नाह ! कल से फिर तुम्हें गिरना और गिर कर संभालना ही होगा !

यूँ ही गिरते, संभलते, मेरे सामने आँसू रोकते , माँ के सामने अश्क बहाते और एक इमोशन रहित चेहरे को देखते हुए तुम न केवल साइकिल चलाना सीख गए बल्कि जीवन में खुद से उड़ना भी सीख गए । एक दिन एअरपोर्ट ने रोकर गले मिलते माँ-बेटे को देखा और देखा किसी के दो और बाल को सफ़ेद होते हुए। और ऊंचाइयों को छूने के लिए तुम उड़ चले।

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विज्ञान कहता है कि प्रेम कुछ नहीं बल्कि कुछ केमिकल और हार्मोनल लोचा है। शायद यही सच है क्योंकि इमोशन को रोकना भी केमिकल और हार्मोनल फैक्टर पर ही डिपेंड करता होगा। तभी तो जब पहली बार साइकिल सीखते हुए गिरे थे तो जिस इमोशन को मैंने रोका था वो एक सफ़ेद बाल के रूप में कनपट्टी के पास निकल आया था। ऐसे ही एक-एक कर कितने सफ़ेद बाल आ गए। अब तुम्हारी मम्मी कहती है कि बाल डाई करना चाहिए मुझे ! कल किसी दूसरे टाइम ज़ोन से मम्मी के साथ वीडियो कॉल पर शायद तुमने मम्मी से कहा था कि पापा को बोलो हेयर कलर कर लें।

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मैंने तो तुम्हे और तुम्हारी मम्मी को कभी भी इमोशन्स को रोकने के लिए नहीं कहा फिर मुझे भी अपने नार्मल इमोशन्स के साथ रहना चाहिए।

है ना ?

©

~ वेद प्रकाश

Friday, February 7, 2020

अनमोल गुलाब

अनमोल गुलाब
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ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनकर, सर के गिले बालों को तौलिया से सुखाते हुए वो खिड़की के पास आ गई अंदाज़ा लगाया कि 9 बज रहे होंगे क्योंकि तक़रीबन इसी समय ये ट्रेन प्रतिदिन गुजरती है। कमरे में मोमबत्ती की मद्धिम रोशनी मे उसने एक नज़र उस चीनी मिट्टी के बर्तन पर डाली जहाँ लाल गुलाबों की कलियाँ करीने से पानी मे भिंगो कर रखी हुई थी। बगल मे गरम खाना तैयार रखा था। कमरे में मोमबत्ती मद्धिम रौशनी बिखेर रही थी। बस, अब उनके आने का इंतजार था।
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दरवाजे पर दस्तक होते ही, सर से तौलिया हटाते हुए उधर लपकी। दरवाज़ा खोलकर किनारे हटते हुये उनको अन्दर आने की जगह दी। उनको खाली हाथ अन्दर आते देख उसे थोड़ा अटपटा लगा, थोड़ी कौतुहल भी हुई। उनके फ़्रेश होकर आने तक मे उसने खाना लगा दिया था और मोमबत्ती की मद्धिम रौशनी में कमरे मे पड़े गुलाबों की ओर देखते हुए पूछा कि आज सारे गुलाब बिक गये ?
"हाँ, और तिगुने दाम मे बिके। कल बिजली बिल भी भर दूंगा। इस मोमबत्ती से भी छुटकारा और पंखा चलेगा तो तुमहे रात मे गर्मी की वजह से नहाना भी नहीं पड़ेगा।"
"क्या? सारे सौ-के-सौ गुलाब बिक गये आज ?"
"नहीं, 99 बिके। आज कुछ खास दिन है, शायद। लोग अपने खास लोगों को गुलाब दे रहे थे। मैंने भी एक बचा लिया, तुम्हारे लिए।"

©वेद प्रकाश