ज्यूडिशियल एक्टिविज्म
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अभी एक न्यूज़ छपी थी कि मिलिट्री में किरानी के पद के लिए जो परीक्षा आयोजित की गई थी उसमे अभ्यर्थियों को केवल जांघिया/चड्डी पहन कर परीक्षा में शामिल होने दिया गया।
हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस न्यूज़ को PIL में तब्दील कर दिया और सरकार से इस "अमानवीय" कृत के लिए जवाब माँगा है।
अब आगे क्या होगा ये तो समय ही बताएगा।
लेकिन कुछ पहलु विचारणीय है :
==> (A) सेना ने ऐसा निर्णय क्यों लिया ?
कदाचार रोकने के लिए। ये कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि परीक्षा में कितना कदाचार होता है। परीक्षार्थी और निरीक्षक का रेश्यो इतना संतुलित नहीं होता कि निरीक्षण कार्य में लगे लोग कदाचारमुक्त परीक्षा करा सकें।
दूसरा पहलु : टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जा सकता था। cctv के surveillance में एग्जाम।
==> (B) परीक्षार्थियों ने इस "अमानवीय" आदेश को क्यों माना ?
1. बेरोजगारी :
कुछ हद तक !
दूसरा पहलु : रोजगार के अनगिनत अवसर हैं। बस अपने सोच का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।
2. सरकारी नौकरी की महता :
बिहार के युवाओं में सरकारी नौकरी पाने की ललक और सरकारी नौकरी की मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास में महता। हर गार्डियन चाहता है कि उसका बच्चा सरकारी नौकर बन जाय। भविष्य संवर जायगा। बुढ़ापे में पेंशन और पूरी नौकरी बिना कार्य किये तनख्वाह !
दूसरा पहलु : अब वो जमाना नहीं रहा। प्रतियोगिता का दौर है। प्राइवेट सेक्टर से कड़ी स्पर्धा है। प्राइवेट क्षेत्र भी अच्छी सैलरी देते हैं और सरकारी क्षेत्र में भी खूब काम करना होता है। किसी रेलवे वाले से पूछिये। कुछ अपवाद जरूर होते हैं।
3. संवेदना शुन्य हो जाना :
हाँ, एक तरीके से। एक तपस्वी संवेदना शून्य होता है । ये अभ्यर्थी भी एक तपस्वी से कम नहीं। पटना के कोचिंग सेंटर और लॉज का एक चक्कर लगा आइये। पता चल जायगा कि इन्हें तपस्वी क्यों कहा जा रहा है।
दूसरा पहलु : अगर आप सांसारिक जीवन में हैं तो संवेदना शुन्य हो जाना मर जाने से भी बदतर है।
==> (C) कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना : कितना व्यवहारिक ?
-----> कार्यपालिका और न्यायपालिका एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में अक्सर ही घुसपैठ करते रहते हैं। ये जुडिशल एक्टिविज्म का दौर है। इसके फायदे भी हैं और इसके नुकसान भी। कोर्ट को भारत की सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए। एयर कंडिशन्ड रूम में बैठ कर आदेश पारित कर देने से ही सब ठीक हो जाता तो फिर संसार की ये दुर्गति ही क्यों रहती ? कोर्ट तो ये भी आदेश पारित कर सकता है कि सरकार बेरोजगारी ख़त्म कर दे या फिर न्यूनतम तनख्वाह 1 लाख प्रति महीना कर दे! लेकिन क्या आदेश दे देने से ही हो जायगा ?
------> ऋण 30 डिग्री सेलसियस पर काम करवाना क्या अमानवीयता की श्रेणी में नहीं आएगा ? अगर आएगा तो फिर कोर्ट स्वतः संज्ञान ले ले और सियाचिन से सैनिक छावनी हटाने का आदेश दे दे....साथ ही पडोसी देशों को भी आदेश दे दे कि भारत में आक्रमण ना करें...या फिर अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट को ऐसा आदेश पारित करने को बोले !
------> जज साहब ! जब आपकी सवारी निकलती है तो बाकि जनता की गाड़ियों में ब्रेक लगा दिया जाता है। आपको अन्य मानवों की तुलना में ये विशेष सुविधा क्यों ? टैक्स और रोड टैक्स तो सभी लोग बराबर ही भरते हैं। फिर ये भी तो अन्य मानवों के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ !
आप कहेंगे की आपने ये प्रिविलेज अर्जित किया है। ठीक है फिर, उन परीक्षार्थियों को भी प्रिविलेज अर्जित करने दीजिये...तब तक प्रिविलेजड वर्ग जैसा चाहे वैसा एग्जाम ले।
------> जज साहब ! जब ट्रेन के टॉयलेट में 20 रु के जग को जंजीर में बंधा देखता हूँ तो अपमानित महसूस होता है। लगता है कि रेलवे हमें चोर समझती है। जज साहब, स्वतः संज्ञान लेकर इसे बंद करवाइये। क्या कहा ! मग चोरी हो जायगा !! साहब जब यहाँ की जनता मग चोरी कर सकती है तो नौकरी पाने की परीक्षा में नहीं करेगी क्या ? इसलिए परीक्षा हॉल में उन्हें भी chain से बांध दिया गया (यानी केवल चड्डी में बिठाया गया )
-----> और एक आखरी बात :
गांव देहात घूम आइये। युवक एक गंजी और लुंगी में बाजार में घूमते मिलेंगे। किसान केवल चड्डी में हल चलाता हुआ मिलेगा। अधिकांश परीक्षार्थी उसी बैकग्राउंड के थे अतः उन्हें ये अमानवीय नहीं लगा होगा।