एक जंगल मे एक महात्मा रहते थे। नियमित रूप से वो संध्या ६ बजे ध्यान लगा कर
बैठा करते थे। एक दिन कहीं से एक बिल्ली उनके आश्रम मे आ
गयी। जब महात्मा ध्यान लगाने बैठे तो वो बिल्ली तंग करने
लगी। महात्मा ने शिष्यों से कहा की इसे पेड़ से बांध दो। उस दिन
के बाद से, महात्मा के ध्यान मे बैठने से पहले ही शिष्य उस
बिल्ली को बांध देते थे।
यही क्रम चलता रहा। समय के साथ महात्मा भी बदलते रहे
और बिल्ली भी।
एक दिन कोई जंगली जानवर आश्रम में घुस आया और
बिल्ली को उठा ले गया।
अगले दिन जब महात्मा ध्यान मे बैठने वाले थे तो उन्होंने देखा की पेड़ से कोई
बिल्ली बंधी हुई नही है। उन्होंने शिष्यों को आवाज़
दी। शिष्यों ने आश्रम छान मारा पर
बिल्ली मिली नही।
अब महात्मा ने कहा की अगर पेड़ से
बिल्ली नही बांधी गयी तो मै ध्यान मे कैसे
बैठूंगा? ये तो हमारे आश्रम की परंपरा है। फिर शिष्यों ने एक
बिल्ली ढूंड कर लायी। उसको पेड़ से बांधा गया, फिर महात्मा ध्यान
मे बैठे।
अब इस कहानी को आजकल के कुछ प्रचलित रिवाजों से तुलना कर के आप
खुद देखिये। मै एकाध उदहारण देता हू :
1) जो लोग जनेउ धारण करते हैं, वो सुसु करने के पहले उसको कान में लपेटते हैं।
ऐसा करना नियम है। वर्ना जनेउ अशुद्ध हो जायेगी।
अब आप उस समय को सोचिये जब जनेउ पहनने की प्रथा चालू हुई
होगी। पुरुष बैठ कर सुसु करते थे और शरीर
का उपरी भाग या तो वस्त्रहीन होता था या अंगोछा लेते थे। अब
वो कमर से निचे तक लटकते जनेउ को कान मे लपेट कर छोटा नही करते
तो वो धुल-मिट्टी से गन्दा होता। इसलिए
ऐसा करना व्यावहारिकता थी। अभी के ड्रेस के साथ या खड़े हो कर
urinal मे सुसु करते समय उसको कान मे लपेटने का क्या औचित्य है?
2) पहले मृत्यु महामारी से हुआ करती थी। गांव के
गांव ख़त्म हो जाते थे। उस स्थिति मे hygine maintain करना अनिवार्य होता था। इसलिये
मृत्यु के बाद परिवारवाले सदा, बिना तेल मसाला, भोजन करते थे। बाल जीवाणु के
लिये आश्रय स्थल होता है, इसलिए सर मुंडन करा लेते थे। अभी के
परिपेक्ष्य मे इस परंपरा की क्या आवस्यकता है?
3) इस्लाम मे बुरका और दाढ़ी का प्रचलन है। 1400 साल पहले
जहाँ इस्लाम शुरू हुआ वहां के मौसम के अनुसार शरीर और चेहरे
को तीखी धुप से बचाना अनिवार्य था। लेकिन हर जगह
तो वैसा weather नही है। फिर धर्म के नाम पर इसे थोपने
की क्या आवश्यकता है? अभी जो लड़कियां india मे बाइक
चलाती हैं वो बुरका से भी ज्यादा शरीर
को ढकती है , गर्मी के दोपहर मे। क्योंकि ये weather का डिमांड
है, धर्म का नही।
# ये धर्म को गलत कहने के उद्देश्य से नही लिखा मैने। मै बस अप्रासंगिक
रिवाजों की ओर ध्यान खीचना चाहता हू।
Monday, January 5, 2015
अंधश्रद्धा
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