तुम नीलकंठ
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"हल्लो ! अभी तक सो रहे हो क्या ?"
" हाँ, आज छुट्टी है। लेट तक सोऊंगा", उनींदी आवाज़ में मैंने कहा।
"न, आज नहीं। नहा कर शिव मंदिर के बाहर मिलो। और सुनो, कुछ खाना मत।"
मैं समझ गया कि छुट्टी के दिन इन्हें शिव मंदिर के पास वाले ढाबे में दही-पराठा खाना होगा। तैयार होकर पहुंचा तो मैडम नए रूप में ही थीं।
सफ़ेद कुर्ते पर लाल चुन्नर, लाल बिंदी और दोनों कलाइयों में एक-एक लाल चूड़ी। अप्रतिम सुंदरी लग रही थी। खैर, एक स्माइल देकर उसकी ऊँगली पकड़ ढाबे की ओर बढ़ने को हुआ तो वो हाथ खिंचती हुई , शिव मंदिर को दिखाते हुए बोली कि आज इधर, उधर नहीं।
मेरे चेहरे पर प्रश्न के भाव पढ़ कर बोली कि आज किस चीज़ की छुट्टी है तुम्हारी ?
"शिव अष्ठमी की", अटकते हुए मैंने कहा।
अपनी हँसी को रोकने का कोशिश करते हुए बोली, "शिव अष्ठमी नहीं, शिव रात्रि की बुद्धू।"
"जो भी हो, तुम्हे पता है न कि मैं मंदिर नहीं जाता हूँ।"
"हाँ, लेकिन आज चलो तो सही। मेरे लिए।"
खैर, उनके पीछे यंत्रवत चलते हुए मंदिर में जो भी formalities की जाती हैं वो रोबोट की तरह निबटा डाला।
"अब चलें ब्रेकफास्ट के लिए ?"
" पहले थोड़ी देर तलैया के पास वाली सीढ़ी पर बैठते हैं।"
सीढ़ी पर बैठ उनके लाल चूड़ी पर ऊँगली फंसाते हुए मैंने कहा कि मेरे लिए शिव तुम ही हो।
"कैसे?"
"क्योंकि कितनी बार तो तुम मेरी गलतियों को पी जाती हो। गलतियाँ ही तो विष होती हैं। हर बार मुझसे कुछ-न-कुछ गलतियाँ होती है और तुम..."
उसने लाल चूड़ी वाली दूसरी कलाई से मेरे मुँह को बंद कर बात पूरी करने से रोक लिया।
कुछ देर की ख़ामोशी के बाद बोली कि मेरा गला तुम्हे कभी नीला दिखाई देता है ? नहीं न। अगर कुछ पीती भी हूँ तो उसे फिर तुम ही तो बाहर निकाल देते हो।
एक लंबी ख़ामोशी के बाद .... माहौल को हल्का बनाने के लिए उसे अपनी ओर खींचते हुए कहा कि आज kiss day भी है।
"आज मेरा व्रत है", मुझे परे ठेलते हुए बोली।
"लेकिन मेरा तो व्रत नहीं है न !" मैंने थोड़ा शरारती लहजे में कहा।
"हाँ, पता है कि तुम व्रत नहीं रख सकते। चलो तुम्हारे किये दही-पराठा आर्डर करते हैं।"
"और kiss day ....?"
"कहा न मेरा व्रत है। अब चलो यहाँ से।"
© वेद
NB : जिस साल ये कहानी लिखी थी उस साल शिवरात्रि भी थी
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