Saturday, February 6, 2021

एक डंठल प्रेम का

एक डंठल प्रेम का
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रुई के फाहे की तरह गिरती बर्फ ....... बर्फ से ढंके होने पर भी सूखता ओंठ ... उखड़ती साँस .... लाल होता बर्फ ... ठाँय-ठाँय की आवाज़ .......

और पसीने से तर-बतर सुमन ....

उफ़्फ़ ... फिर से यही सपना। आँख मूंदे-मूंदे ही सुमन ने करवट बदल कर निखिल को बाँहों में भर लेना चाहा .... लेकिन करवट बदलते ही खाली बेड .... घबरा कर आँखे खोल लीं सुमन ने।

सुबह हो चुकी थी ... रोशनदान से सुनहली किरणें छन कर कमरे में आ रही थीं

.... निखिल कहाँ गया ! ये सोचते हुए वो उठने को हुई ही थी कि अपने हाथों में कुछ छिपाये हुए निखिल कमरे में दाखिल हुआ।

"हेपी, लोज डे" कहते हुए निखिल ने एकदम सुर्ख लाल गुलाब सुमन की ओर बढ़ा दिया।

"छो छ्वीट ऑफ़ यू" कहते हुए सुमन ने गुलाब ले लिया और निखिल ने सुमन के chin पर मुस्कुराते हुए काले तिल को चूम लिया। इस चुम्बन का असर या निखिल की warm huggy का असर ... या पता नहीं क्या था कि बंद कमरे में भी सुर्ख गुलाब पर ओस की दो बूंदे टपक पड़ी।

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सुमन को अक्सरहां निखिल में हर्ष का अक्स दिखाई देता है .... या फिर हर्ष को वो निखिल में ढूंढती है। हर्ष उसके कॉलेज का दोस्त ... सुमन और हर्ष की जोड़ी कॉलेज में फेमस थी।
घर वालों के विरोध के बावजूद दोनों ने शादी कर लिया था और अपनी गृहस्थी बसा ली थी।

शादी के चौथे साल ..... वैलेंटाइन डे के दिन हर्ष कोलकाता में था और सुमन अपने घर डेल्ही में। हर्ष ने  अपने स्टाफ के through उसे वैलेंटाइन गिफ्ट भिजवाया था .... गिफ्ट खोलने के बाद सुमन फोन कर हर्ष से पूछी थी,
" मेरे शाहजहाँ, इस डंठल का मैं क्या करूँ ?"

और उधर से हर्ष ने कहा था कि बाग़ में लगा दो .... किसी साल अगर मैं वहाँ न रहूँ तो इस डंठल से जो गुलाब पौधा उग आएगा, उसपर खिले गुलाब को मेरी तरफ से गिफ्ट समझ लेना।

कॉलेज में शुरू हुई प्रेम कहनियों में अक्सरहां ग्रहण लग ही जाता है। ये दोनों भी विधाता से अपनी प्रेम कहानी बस 7 साल के लिए लिखवा कर लाए थे।

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निखिल अब सुमन के तिल पर उँगलियाँ फिरा रहा था और सुमन हर्ष में खोई थी ...आँखों से अभी और ओस की बूंदे टपकने ही वाले थे कि ड्राइंग रूम में किसी ने टीवी या म्यूजिक सिस्टम ऑन कर दिया था और गाना बज रहा था ...

"ओ यूँ ना लम्हा लम्हा मेरी याद में
होके तन्हा तन्हा मेरे बाद में नैना अश्क ना हो
माना कल से होंगे हम दूर
नैना अश्क ना हो, नैना अश्क ना हो

मैं ना लौटू आने वाले साल जो
मेरी वर्दी बोले मेरे हाल तो अश्क ना हो
ये समझना मैं हूँ मजबूर
नैना अश्क ना हो, नैना अश्क ना हो "

             और सुमन ने एक सैलाब को आँखों में ही जब्त कर लिया और निखिल को चूमते हुए बोली,

"लव यू, हर्ष"

"अले, मैं तो निक्कू हूँ दादी। तुम मुझे दादा जी के नाम छे क्यों बुलाती हो",  कसमसाकर सुमन से अलग होते हुए निखिल बोला।

और हर्ष, जो की शादी के सातवें साल ही बर्फीले बॉर्डर की रक्षा करते हुए शहीद हुआ था, के द्वारा दसकों पहले भेजे हुए डंठल से उग आए बगान से निकले गुलाब को चूमते हुए सुमन बोली,

"हैप्पी रोज डे, हर्ष"

~वेद~

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