दवाई की खाली शीशी या ऐसे ही किसी शीशी का दीया बना कर यूज़ किया जाता था। फिर "मिट्टी तेल" से जलने वाले लैंप /लालटेन का जमाना आया। रौशनी तेज आती थी और हवा से सुरक्षा भी थी लेकिन लैंप का शीशा नित्य साफ़ करना पड़ता था। साफ़ करते समय कभी-कभी हाथ कट भी जाता था। लौ को भी एडजस्ट कर रखना पड़ता था ; ज्यादा तेज हुआ नहीं कि तुरंत कालिख बैठ जाती थी। लैंप के शीशे के टॉप पर एक "cylindrical टोपा" जोड़कर कालिख जमने के रेट को कम किया जाता था। बाद में लैंप के साथ फ्रेम और टिन का टोपा आने लगा।
अँधेरे से लड़ने पर कालिख तो लगता ही है; कम करने के उपाय भी हैं। सामर्थ्य से ज्यादा करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।