बिल्वपत्र के फूल
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"बोल बम..बोल बम....भोले बाबा पार करेगा..हर हर महादेव....बोल बम..बोल बम.."
रात साढ़े ग्यारह बजे जैसे ही बेड पर आया, ये नारे खिड़की के रास्ते रूम में शोर मचाने लगे। ये नारे आ क्यों रहे हैं ये सोचते हुए ध्यान आया कि कल से सावन का महीना शुरू हो रहा है और कांवड़िये रात भर चल कर सुबह भैरव मंदिर में जल चढ़ाने जा रहे हैं। एक जत्था अभी गुज़रता नहीं था कि दूसरे कांवड़ियों का जयकारा शुरू हो जाता था। मन एकदम से चिड़चिड़ा सा हो गया। दिन भर की थकावट के बाद सोने के समय ये शोर शराबा। खिड़की बंद कर सोने की कोशिश करता रहा...काफी देर बाद नींद आई होगी।
"बेलपतअअर...बेलपतअअर......" की आवाज़ से सुबह नींद खुली। लेट से सोने के कारन आँख में जलन सी हो रही थी। घड़ी देखा तो सुबह के पांच बजे थे। बाहर बालकनी में आकर देखा तो गली में 4-5 बच्चे बेलपत्र बेचने के लिए घूम-घूम कर आवाज़ लगा रहे थे।
सावन...भगवान...शिव...कांवड़ियों...पुजारियों...बेलपत्र बेचने वाले गली के बच्चों...इन सबको कोसते हुए सोने की कोशिश करता रहा। 7 बजे कॉल बेल बजा। अनीता थी। मेरी मेड सर्वेंट। माथे पर टिका और हाथों में हरी चूड़ियाँ। एक पुड़िया मेरी और बढ़ाते हुए बोली, "अंकल, भोले बाबा का प्रसाद है...जल डाल कर आ रहे हैं...आज पहला सावन है न। इसलिए आने में लेट भी हुआ।"
वो ठीक 6 बजे आती थी। उसी के कॉल बेल बजाने से मैं उठता था और फिर मॉर्निंग वाक के लिये निकल जाता था। आज....आज नहीं कल रात से ही सब गड़बड़ हो रहा था।
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2 महीना पहले ही मैं इस नए शहर में तबादला लेकर आया हूँ। हाँ, तबादला लेकर....बॉस से बनती नहीं थी इसलिए मैंने खुद तबादले का आवेदन दिया था। पत्नी साथ नहीं आई थी। वो मानसी बिटिया के यहाँ पिछले 3 महीने से थी। मानसी बिटिया को ट्विन बेबी हुआ था..वो उसी की देखभाल के लिए उसके यहाँ चली गई थी। बेटा बंगलोर में अपने जॉब में व्यस्त था।
यहाँ खाना पकाने और घर के काम के लिए अनीता नाम की मेड सर्वेंट रख लिया था। वो कोई बाईस-पच्चीस साल की थी। पास ही किसी झुग्गी में रहती थी। चार बच्चों और एक शराबी पति की जिम्मेवारी उसपर थी।
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प्रसाद की पुड़िया लेते हुए सारा फ्रस्ट्रेशन अनीता पर फूट पड़ा....कांवड़ियों...बेलपत्र बेचने वालों को बुरा भला कहा और पूजा पाठ की व्यर्थता पर भी लेक्चर दे डाला। मेड सर्वेन्ट्स भी ढीठ होती हैं। कान में रुई डाल वो अपने काम में लग गई। जाते समय बोल गई कि "बेलपतअअर" बेचने वालों में एक मेरा बेटा भी है। बोल दूंगी कि इस गल्ली में धीरे आवाज़ दे।
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ऑफिस जाते हुए जाम में फँस गया। आज पहली बार। रास्ते में एक शिव मंदिर पड़ता है और मूर्खों की भीड़ के कारन रोड जाम था। फिर से एक बार सावन ... शिव ... पूजा और कांवड़ियों को मन ही मन बुरा भला कहा। ऑफिस पहुँचा तो आज रूम भी खुला नहीं मिला। मेरे ही पीछे-पीछे पिउन आया और रूम खोलते हुए बोला कि मंदिर गया था इसलिए लेट हो गया। मेरा फ्रस्ट्रेशन अपने चरम पर था। अब तक जमा हुआ सारा फ्रस्ट्रेशन फट पड़ा निवेदिता पर। निवेदिता -- मेरी स्टेनो। लेट आई और कारन...वही पहला सावन।
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निवेदिता.... उम्र 18 साल दो महीना। इस ऑफिस में हम दोनों एक ही दिन ज्वाइन किये हैं। मैं ट्रान्सफर लेकर और वो अपने पिताजी की मृत्यु के बाद कम्पैसनेट ग्राउंड पर...पिता जी को गुज़रे तो साल भर हो चुके थे..लेकिन वो 18 साल की नहीं हुई थी। 18 साल होते ही विभाग में उसे जॉब मिल गया था।
करीब घंटे भर बाद चाय की सिप के साथ मूड थोड़ा ठीक हुआ तो निवेदिता को बुलाकर कल रात से अब तक की घटना सुनाया और अपने गुस्सा हो जाने का कारण समझाया। मितभाषी निवेदिता कुछ देर शांत रही फिर बोली कि सर लंच ब्रेक में आपसे इस बारे में बात करना चाहूंगी अगर आप इज़ाज़त दें। मेरे हामी भरने पर उसने अगला रिक्वेस्ट रखा कि आज मैं अपने साथ लाया लंच न खाकर वो खा लूँ जो वो मंगा देगी। मैंने हामी भर दी।
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कोई लंच का पैकेट दे गया था। लंच सच में डिलीशियस था...हर निवाले के साथ पूर्णिमा की याद सताती थी। पूर्णिमा यानि मेरी वामांगी। वो भी ऐसा ही टेस्टी खाना पकाती है। लंच के बाद निवेदिता को बुलाया और लंच की तारीफ करते हुए लंच के पैसों के बारे में पूछा। उसने सपाट सा उत्तर दिया...50रुपया। वो पैसे मैंने उसे दे दिया। वो बोली, "सर, जब इतना ही टेस्टी लंच था तो कुछ टिप तो बनता ही है।" मैं थोड़े आश्चर्य से उसकी तरफ देखा। लेकिन कोई शरारत या मज़ाक का भाव उसके चेहरे पर नहीं दिखा। फिर भी टिप के नाम पर उसे पैसे देना मुझे अटपटा लगा और मैंने नहीं दिया।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वो बोली," सर, पॉलिटिकल डिबेट हो या दो धर्मों की तुलना
का या फिर आस्तिकता और नास्तिकता का....निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता। हर पक्ष बस अपने को सही साबित करने को डिबेट करता है....कुतर्क करता है। इसलिए मैं आपसे कोई डिबेट नहीं करुँगी। कुछ बातें जो मैं सोचती हूँ वो आपसे शेयर करना चाहती हूँ अगर आप सुनें।"
मेरे हामी भरते ही एक दीर्घ निःस्वास छोड़कर उसने बोलना शुरू किया।
" आपको कांवड़ियों में मवाली नज़र आते हैं। नशा करने वाले बेरोज़गार लड़के नज़र आते हैं। उनके नारों से नींद में खलल पड़ती होगी। इसी तरह सबे बारात की रात हुड़दंग मचाते हुए मवाली मुस्लिम लड़के नज़र आते होंगे। क्रिसमस और न्यू इयर के भीड़ में लड़कियों को छेड़ते....नशा करते लोग नज़र आते होंगे। बेलपत्र बेचते गंदे बच्चे नज़र आते होंगे। ऐसे बच्चे जो स्कूल नहीं जाते। पढ़ाई नहीं करते। सावन में दूध की बर्बादी नज़र आती होगी। मैं एक लड़की हूँ। सुबह मंदिर गई तो पूजा के बहाने आए हुए कई मवाली लड़कों की नज़र मुझे बिंध गई। लेकिन कल फिर जाऊँगी मंदिर क्योंकि मवाली लड़कों की शोर से ध्यान हटाने पर वो वैसे लोग भी नज़र आते हैं जो अपने घर वालों कि खुशियों के लिए भोले बाबा पर जल अर्पण करने आए होते हैं। वो लड़की भी नज़र आती है जिसे बाकि लड़कियों की उपस्थिति के कारण ही मंदिर जाने की हिम्मत आ पाती है। मेरे जैसे लोग मंदिर जाना बंद कर दें तो फिर वो पूर्ण रूप से मवालियों का ही अड्डा हो जाय। सबे बारात की हुड़दंग नज़र आती है लेकिन शांति से प्रार्थना करते हुए लोग नज़र नहीं आते। हुड़दंगियों से नज़र हटाने पर वो नज़र आयेंगे जो शांत मन से प्रार्थना कर रहे होते हैं। न्यू इयर...क्रिसमस में सजे दुकानों की भीड़ में भी मवाली से नज़र हटाइये तो वो दुकानदार नज़र आएगा जिसकी कई उम्मीदें बस इस भीड़ के कारण होने वाली बिक्री से पूरी होगी। बेलपत्र बेचता लड़का आपको गन्दा लगता है। इसी बेलपत्र के पैसों से वो इस महीने अपनी पसंद की चीज़े खा सकेगा। अपने कुछ छोटे-मोटे शौक पूरा कर पाएगा, और वो भी मेहनत की कमाई से। बेलपत्र अर्पण करने वाले खुद क्यों नहीं बेलपत्र तोड़ लाते ? इन्ही बच्चों के कारण वे लोग आराम से घर में टी. वी. देखते हैं और सुबह बेलपत्र मिल जाता है। मवाली तो मेरे स्कूल में भी थे; तो क्या स्कूल छोड़ देती ? ऑफिस में भी कितनो की नज़र इन मवालियों से भी गंदी है; तो क्या ऑफिस छोड़ दूँ ? रोड जाम तो कई कारण से होता है..नेता की रैली हो या फिर बरसात का जल जमाव। फिर केवल आस्तिकों को क्यों कोसना ? सीजन के साथ सब्जियां महँगी होती है। दाल 200 रु किलो है। सावन में दूध महंगा हुआ ? नहीं न ! दूध की किल्लत है ? नहीं न ! अगर दूध की डिमांड बढ़ गई तो फिर महंगा क्यों नहीं हुआ ? क्योंकि जो दूध चढ़ाया जा रहा है वो सफ़ेद पानी है...मिलावट कर दिया जाता है। पूजा करना मूर्खता है या नहीं..ये अपना-अपना चॉइस है। मुझे या मुझ जैसे लोगों को मानसिक शांति मिलती है। मन शांत हो तो सब अच्छा होता है। आज आपका लंच मंगवाने के पीछे भी यही कारण था। जैसा मन वैसा अन्न...जैसा अन्न वैसा मन। और जो मेरे यहाँ खाना बनती है वो मन की बहुत अच्छी है..मन की अच्छी है तो खाना भी आपको टेस्टी लगा...और फिर आपके मन में प्रसन्नता भी दिखी मुझे। और हाँ, वो टिप भी मैंने उसी खाना बनानेवाली के लिए माँगा था। ये छोटे अमाउंट हमारे लिए कुछ नहीं होते लेकिन उनकी कई जरूरतें पूरी कर जाते हैं। आप अपने यहाँ भी खाना बनानेवाली की जरूरतों का ध्यान रखिये फिर उसके बनाए खाने का भी टेस्ट बढ़ जाएगा और आपका मन इतना प्रसन्न रहेगा कि किसी कांवड़िये की आवाज़ से नींद भंग नहीं होगी।"
मैंने कहा कि मैं कुछ बोलूँ ?
उसने कहा, " सर मैं डिबेट कर ही नहीं रही। आपके विचार भी किसी दिन सुनेंगे। आज आपने मेरा सुना। अब आपके लेटर्स टाइप कर दूँ वर्ना आप फिर गुस्सा हो जायेंगे।"
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ऑफिस से निकलते हुए मैंने निवेदिता को 50 रु का नोट पकड़ाते हुए कहा कि ये खाना बनाने वाली को मेरा टिप। घर के पास ही एक फ़ास्ट फ़ूड सेंटर पर वेज रोल पैक कराते हुए देखा कि बेलपत्र बेचने वाले बच्चे भर-भर प्लेट चाउमीन खा रहे हैं... उनसे पूछा कि तुम में से कोई अनीता का बेटा भी है ? एक मरियल सा बच्चा आया और बोला कि मेरी माँ आपके यहाँ काम करती है।
मैंने पूछा कि स्कूल नहीं जाते ?
जवाब आया कि जाता हूँ लेकिन इस महीने पैसे कमाने हैं। अगले महीने से रोज जाऊंगा।
मैंने बेलपत्र का दाम पूछ कर कल से रोज 10 रूपये का बेलपत्र पहुँचाने का आर्डर कर दिया।
घर की और बढ़ते हुए सोच रहा था कि आर्डर तो कर दिया, पर बेलपत्र का करूँगा क्या ?
शायद फूलों के गमले पर डाल दूंगा..खाद बन कर बेलपत्र फूलों के पौधों से फूल बन कर ही निकलेंगे।
बिल्वपत्र फूल में परिवर्तित हो रहे थे और मस्तिष्क में मचा तांडव कृष्ण की बांसुरी की धुन में।
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©
वेद प्रकाश
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