अनमोल गुलाब
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ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनकर, सर के गिले बालों को तौलिया से सुखाते हुए वो खिड़की के पास आ गई अंदाज़ा लगाया कि 9 बज रहे होंगे क्योंकि तक़रीबन इसी समय ये ट्रेन प्रतिदिन गुजरती है। कमरे में मोमबत्ती की मद्धिम रोशनी मे उसने एक नज़र उस चीनी मिट्टी के बर्तन पर डाली जहाँ लाल गुलाबों की कलियाँ करीने से पानी मे भिंगो कर रखी हुई थी। बगल मे गरम खाना तैयार रखा था। कमरे में मोमबत्ती मद्धिम रौशनी बिखेर रही थी। बस, अब उनके आने का इंतजार था।
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दरवाजे पर दस्तक होते ही, सर से तौलिया हटाते हुए उधर लपकी। दरवाज़ा खोलकर किनारे हटते हुये उनको अन्दर आने की जगह दी। उनको खाली हाथ अन्दर आते देख उसे थोड़ा अटपटा लगा, थोड़ी कौतुहल भी हुई। उनके फ़्रेश होकर आने तक मे उसने खाना लगा दिया था और मोमबत्ती की मद्धिम रौशनी में कमरे मे पड़े गुलाबों की ओर देखते हुए पूछा कि आज सारे गुलाब बिक गये ?
"हाँ, और तिगुने दाम मे बिके। कल बिजली बिल भी भर दूंगा। इस मोमबत्ती से भी छुटकारा और पंखा चलेगा तो तुमहे रात मे गर्मी की वजह से नहाना भी नहीं पड़ेगा।"
"क्या? सारे सौ-के-सौ गुलाब बिक गये आज ?"
"नहीं, 99 बिके। आज कुछ खास दिन है, शायद। लोग अपने खास लोगों को गुलाब दे रहे थे। मैंने भी एक बचा लिया, तुम्हारे लिए।"
©वेद प्रकाश
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