"वाह भई ! बड्डे है मेरा और गिफ्ट दिया जा रहा है सुपुत्र को !"
विनीता ने झूठी नाराजगी के साथ ये बात रखी।
निशिकांत ने विनीता के बड्डे पर पत्नी के बजाय अपने 12 साल के बेटे व्योम को एक छोटा सा गिफ्ट बॉक्स पकड़ाया था।
गिफ्ट बॉक्स में एक रेड कलर का मार्बल बॉल और एक चिट्ठी या यूँ कहें कि एक कहानी थी... या कहानी न होकर कुछ और थी। ये तो व्योम ही बता पायेगा।
और ये गिफ्ट किसके लिए था ? व्योम के लिए या विनीता के लिए ? ये भी व्योम ही बता पायेगा या फिर इसका जवाब वक्त के गर्भ में छुपा हुआ है !
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"पापा, देखिये ये रेड वाली मार्बल बॉल मिली मुझे"
दीपावली की साफ-सफाई में गंदे हुए हाथों से निशिकांत ने 5 साल के व्योम को लगभग झकझोरते हुए उस मार्बल बॉल को ऐसे छिना मानो वो कांच की गोली न होकर कोई बेसकीमती हीरा हो।
विनीता भी भौंचक हो गईं और आश्चर्यमिश्रित गुस्से से कहा कि ऐसे क्यों रियेक्ट कर रहे !!!
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1,2,3,4,5,6,7.................. 1032.
एक-एक कर एक हज़ार बत्तीस कंचे कुएँ में समाते चले गए। 1033वां कंचा, लाल रंग का, उसने मुट्ठी में बांध कर रख लिया। तब वो उसका लकी कंचा हुआ करता था। "अड्डी" था वो कंचा....मतलब कंचे वाले खेल में उस कंचे को वो स्ट्राइकर की तरह यूज़ करता था।
कंचे का चैंपियन। ढेर कंचे जीतता था। खेलते समय खाने-पीने का होश तक न रहता था। हाँ, पढाई का होश कभी न गंवाया।
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"बेटा, तुमसे कुछ कहना था।"
निशिकांत उस दिन जीते हुए कंचों को जार में रखते हुए कहा, "हाँ माँ, बोलो।"
"निधि के पिताजी कह रहे थे कि तुम बिगड़ रहे हो। दिन भर कंचे खेलते हो। बिन पिता के बच्चे ऐसे ही गँवार हो जाते हैं।"
"हूँ!" बस इतना ही जवाब दिया था उसने।
"तुम छोड़ दो कंचे खेलना।" माँ ने आगे कहा था।
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निधि के पिताजी कुछ चिढ की वजह से बोले हों या सच में concerned थे ये तो वही जानें क्योंकि ये कंचा खेलने वाला निशिकांत हर साल कक्षा में प्रथम आता था और दो-दो टूशन के बावजूद निधि 2nd आती थी।
और उसी शाम 1,2,3,4,5,6,7.....1032 कंचे कुआं के अंदर समा चुके थे। उसने प्रण किया कि अब वो कभी कंचे नहीं खेलेगा क्योंकि माँ दुःखी हुईं थीं।
और वो रेड स्ट्राइकर !
उसे वो लकी भी मानता था और इसलिए भी रख लिया कि ये उसे उसके प्रण की याद भी दिलाता रहेगा। ऐसा नहीं कि उसने फिर कभी माँ को दुःखी न किया हो, लेकिन वो कंचा उसे हर बार याद दिलाता था कि आगे दुबारा कोई गलती न करे...कम से कम same mistake न करे।
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