Sunday, March 21, 2021

पत्थर

पत्थर
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गाँव के अंतिम छोर में,
एक खंडहरनुमा मंदिर से लगा एक तलैया है।
खूब घास उगती है,
उसके चारो ओर।

हरियाली देख,
अनजान चरवाहे
हाँक ले जाते हैं मवेशियों को,
उस ओर।

लेकिन, अघाये जानवरों संग थके चरवाहे,
लौट आते हैं प्यासे ही।
क्योंकि समुद्र से भी खारा है,
उसका जल।

खूब मीठा हुआ करता था उसका जल,
दादी माँ को उनकी दादी ने बताया था।
धूप, अगर, फूलों की खुशबू के साथ,
घंटे की पावन टंकार घुली होती थी उसमे।

उस मंदिर में विराजे शिला पर,
अपने आर्य के विजयी होने की
मनोकामना दिल में संजोये,
प्राणप्रतिष्ठा किया था एक रानी ने।

फिर एक दिन,

नई पटरानियों की टोली संग
लौट आया विजयी राजा।

उस दिन,

ना घंटे की आवाज़ सुनाई दी
और ना ही धूप और अगर की खुशबू फैली।
उठ गया रानी का विश्वास
और खंडित हो गई पूजा।

पत्थर की मूर्ति में
प्राणप्रतिष्ठा करनेवाली ही
जब अविश्वास करेगी,
तब उसे और कौन पूजेगा ?

और फिर,
उस पत्थर से एक धार फूटी
और जा मिली तलैया में।

निष्ठुरता दर्शाने को,
कवियों और कथाकारों को
आज तक नहीं मिला है
पत्थर से बेहतरीन कुछ।

क्या सच में होते हैं
पत्थर इतने संवेदनहीन ?

©वेद

1 comment:

  1. नहीं! पत्थर मेरे जैसे होते हैं 🙂

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