सफ़ेद आँसू
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....घुटना छिल गया था तुम्हारा। आँखों में दर्द से ज्यादा दुःख के आँसू थे। घर लौटते ही मम्मी के प्यार से बाँध टूट गया और आँसू झर-झर गिरने लगा। डेटॉल लगाते हुए तुम्हारी मम्मी कह रहीं थी कि मुझे ध्यान देना चाहिए था...कैसे गिर गया ! कंघी करते हुए मैंने देखा कि कनपट्टी के पास का एक बाल सफ़ेद हो गया है !
अगले सुबह तुम्हारा मन नहीं था साथ चलने का। मम्मी भी कह रहीं थी कि अगर चोट दुःख रहा है तो आज मत जाओ। तुम मेरी तरफ देख रहे थे और कोई रिस्पांस न पाकर साथ चल पड़े। आज disbalance होने से पहले ही तुम्हारी साइकिल को मैं थाम तो ले रहा था लेकिन आज कुछ सीख भी न पाए तुम !
नाह ! कल से फिर तुम्हें गिरना और गिर कर संभालना ही होगा !
यूँ ही गिरते, संभलते, मेरे सामने आँसू रोकते , माँ के सामने अश्क बहाते और एक इमोशन रहित चेहरे को देखते हुए तुम न केवल साइकिल चलाना सीख गए बल्कि जीवन में खुद से उड़ना भी सीख गए । एक दिन एअरपोर्ट ने रोकर गले मिलते माँ-बेटे को देखा और देखा किसी के दो और बाल को सफ़ेद होते हुए। और ऊंचाइयों को छूने के लिए तुम उड़ चले।
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विज्ञान कहता है कि प्रेम कुछ नहीं बल्कि कुछ केमिकल और हार्मोनल लोचा है। शायद यही सच है क्योंकि इमोशन को रोकना भी केमिकल और हार्मोनल फैक्टर पर ही डिपेंड करता होगा। तभी तो जब पहली बार साइकिल सीखते हुए गिरे थे तो जिस इमोशन को मैंने रोका था वो एक सफ़ेद बाल के रूप में कनपट्टी के पास निकल आया था। ऐसे ही एक-एक कर कितने सफ़ेद बाल आ गए। अब तुम्हारी मम्मी कहती है कि बाल डाई करना चाहिए मुझे ! कल किसी दूसरे टाइम ज़ोन से मम्मी के साथ वीडियो कॉल पर शायद तुमने मम्मी से कहा था कि पापा को बोलो हेयर कलर कर लें।
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मैंने तो तुम्हे और तुम्हारी मम्मी को कभी भी इमोशन्स को रोकने के लिए नहीं कहा फिर मुझे भी अपने नार्मल इमोशन्स के साथ रहना चाहिए।
है ना ?
©
~ वेद प्रकाश
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